किसी ने कुछ कह दिया और हम disturb हो गये ,या फिर उस बात को सोचते रहे ,बार बार सोचते रहे और इतना कि लगा जैसे हमारा जीवन ही ठहर गया हो – कैसे कह दिया किसी ने , क्यों कह दिया उसने ,कहने से पहले सोचा क्यों नहीं वग़ैरह वग़ैरह — ये सब क्या है ?
ये तो हम अपने साथ ही ज़्यादती कर रहे हैं , अपने उन लम्हों को बेकार कर रहे हैं और अपनी energy ज़ाया कर रहे हैं। इसके अलावा जो हमारा potential था कि उस घड़ी हम कुछ productive करते – वो भी नहीं कर रहे हैं – क्यों ?क्योकि हमारे सोचने समझने की सलाहियत तो रही नहीं।
हम ये भी भूल जाते हैं कि इतना सोच कर जो हम अपना तनाव बढ़ाते हैं उसके कारण हमारे brain में एक hormone adrenalin रिलीज़ होता है जो उस stress से फाइट करता है ,जिसके कारण हमारा ब्लड प्रेशर और हिर्दय की धड़कन बढ़ जाती है और दूसरा hormone cortisol रिलीज़ होता है जो स्ट्रेस के कारण होने वाले डर को क़ाबू करता है । शरीर के बाक़ी हिस्सों की ऊर्जा को वहाँ से तुरंत दिमाग़ की तरफ़ शिफ्ट करता है जहां उसकी ज़्यादा ज़रूरत है।
तो ज़रा गौर कीजिए कि बेवजह हर बात को ख़ुद पर लाद के मुस्सलत कर के हम अपने सिर्फ़ डेढ़ किलो के दिमाग़ को इतना परेशानी में डालते हैं कि उसे कितनी मशक़्कत करनी पड़ती है कहीं cortisol कही adrenal ये सब और भी ना जाने क्या क्या कर के brain की हिफ़ाज़त करते हैं ।
सोचिए तो क्या हम बेवक़ूफ़ी नहीं कर रहे जो शरीर के इतने अहम हिस्से को बेवजह परेशान कर रहे हैं – क्यों ? क्योंकि हमे तो सोचने की आदत है ,हमे परेशान होना अच्छा लगता है ,क्योंकि हम खुश रहने की कोशिश नहीं करते हमे आसानियाँ पसंद हैं।
एक बात हो गई चलो अब ये आसान है कि बिना मेहनत बिना कोशिश बस उसे सोचते रहें सोचते रहें और डेढ़ किलो के दिमाग़ पर मनोभर डालते रहें।
Please please please ऐसा ए करें । अगले ब्लॉग में ख़ुशी पर बात करेंगे…

